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नवरात्रि का तीसरा दिन – माता चंद्रघंटा की कथा, स्वरूप और महत्व
प्रस्तावना
भारतवर्ष में नवरात्रि का पर्व भक्ति, साधना और शक्ति की उपासना का महापर्व है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। प्रत्येक स्वरूप जीवन के एक विशेष गुण और आदर्श का संदेश देता है।
नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के माता चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। यह रूप शांति और वीरता दोनों का अद्भुत संगम है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप साधक को साहस, निर्भयता और विजय का आशीर्वाद देता है।
माता चंद्रघंटा का नाम और अर्थ
माता के मस्तक पर एक अर्धचंद्र के आकार की घंटी (घंटा) विराजमान है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
- "चंद्र" – शांति, शीतलता और दिव्यता का प्रतीक।
- "घंटा" – शक्ति, पराक्रम और जागृति का प्रतीक।
इस प्रकार माता चंद्रघंटा का स्वरूप शांति और वीरता का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करता है।
पौराणिक कथा – माता चंद्रघंटा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती ने तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया, तब उनका विवाह भव्य रीति से संपन्न हुआ।
विवाह के समय भगवान शिव बारातियों सहित विचित्र रूप में आए। उनका शरीर भस्म से लिपटा हुआ था, गले में सर्प, सिर पर जटा और हाथ में त्रिशूल। यह भयंकर रूप देखकर पार्वती के माता-पिता और नगरवासी भयभीत हो गए।
उस समय पार्वती ने अपने चंद्रघंटा स्वरूप को धारण किया। उनके इस रूप से वातावरण शांत और मंगलमय हो गया। सबका भय दूर हो गया और विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
माना जाता है कि युद्ध के समय मां चंद्रघंटा अपनी घंटी के प्रचंड नाद से दानवों का संहार करती हैं। उनके स्वरूप से दुष्टों का नाश और भक्तों का कल्याण होता है।
माता चंद्रघंटा का स्वरूप
- माता चंद्रघंटा का वर्ण स्वर्णिम (सोने के समान चमकदार) है।
- उनके दस हाथ हैं।
- वे शेर पर सवार रहती हैं।
- हाथों में धनुष-बाण, तलवार, त्रिशूल, गदा, कमल और कमंडलु धारण किए हुए हैं।
- उनके मस्तक पर अर्धचंद्राकार घंटा है।
- उनके स्वरूप से अद्भुत शांति और प्रचंड वीरता दोनों झलकते हैं।
नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा विधि
पूजन की तैयारी
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थल पर माता चंद्रघंटा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- कलश स्थापना के बाद पूजन प्रारंभ करें।
पूजन प्रक्रिया
- माता को गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- उन्हें सुगंधित फूल और लाल रंग के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
- भोग में दूध और उससे बने व्यंजन अर्पित करना उत्तम माना जाता है।
- मंत्र का जप करें:- "ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः"
माता चंद्रघंटा की आराधना का महत्व
- भक्तों को साहस और निर्भयता प्राप्त होती है।
- जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
- शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक साधना में सफलता मिलती है।
- हृदय में शांति और मानसिक संतुलन बना रहता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
मां चंद्रघंटा की साधना का संबंध मणिपुर चक्र से है। यह चक्र शक्ति, आत्मविश्वास और निर्भयता का केंद्र है।
इस चक्र के सक्रिय होने से साधक को आत्मबल, निर्णय क्षमता और जीवन में संतुलन प्राप्त होता है।
दार्शनिक संदेश
माता चंद्रघंटा का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि –
- शांति और साहस का संतुलन जीवन में आवश्यक है।
- जब तक हम निर्भय और आत्मविश्वासी नहीं होंगे, तब तक जीवन की चुनौतियों को पार नहीं कर पाएंगे।
- अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी हमें समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखना चाहिए।
आधुनिक जीवन में माता चंद्रघंटा का महत्व
आज के दौर में जब लोग तनाव, भय और असुरक्षा की स्थिति से जूझ रहे हैं, तब माता चंद्रघंटा का स्वरूप प्रेरणा देता है –
- भय का नाश – जीवन की कठिन परिस्थितियों में साहस बनाए रखना।
- निर्णय क्षमता – सही समय पर सही निर्णय लेना।
- आत्मबल – आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच बनाए रखना।
- शांति का भाव – समाज और परिवार में सौहार्द स्थापित करना।
कथा से जुड़ा प्रेरणादायक संदेश
माता चंद्रघंटा की कथा यह बताती है कि –
- भगवान शिव जैसे महातपस्वी भी समाज के रीति-रिवाजों से जुड़े।
- माता पार्वती ने अपने दिव्य स्वरूप से भय को दूर करके परिवार और समाज को आश्वस्त किया।
- इस प्रकार उनका चंद्रघंटा रूप भक्तों को यह शिक्षा देता है कि हर परिस्थिति में साहस और शांति बनाए रखनी चाहिए।
निष्कर्ष
नवरात्रि का तीसरा दिन माता चंद्रघंटा की पूजा का है। उनका स्वरूप साधक को साहस, वीरता और शांति का आशीर्वाद देता है। उनकी आराधना से भय दूर होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
माता चंद्रघंटा का संदेश है कि जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों से डरे बिना उनका सामना करें। शांति और पराक्रम का संतुलन ही जीवन की सच्ची सफलता है।
मुझे उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपने यह
पूरा आर्टिकल पढ़ा, इसके लिए आपका बहुत-बहुत
धन्यवाद। 🙏

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