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नवरात्रि का चौथा दिन – मां कूष्मांडा की कथा, स्वरूप और महत्व
प्रस्तावना
नवरात्रि भारत का प्रमुख पर्व है जिसमें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना और आत्मबल को जाग्रत करने का अवसर भी है।
नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के जिस स्वरूप की पूजा की जाती है, वह है माता कूष्मांडा। मां का यह रूप ब्रह्मांड की सृष्टि से जुड़ा हुआ है। इन्हें सृष्टि की आद्यशक्ति भी कहा जाता है।
माता कूष्मांडा का नाम और अर्थ
"कूष्मांडा" शब्द तीन भागों से बना है –
- कूष्म – कद्दू (Pumpkin)
- अंड – ब्रह्मांड
- आ – करने वाली
इस प्रकार "कूष्मांडा" का अर्थ हुआ – वह देवी जिन्होंने ब्रह्मांड की सृष्टि की।
पौराणिक मान्यता है कि माता कूष्मांडा ने अपने हास्य (हल्के से मुस्कान) से अंधकारमय ब्रह्मांड को प्रकाशमान किया और सृष्टि की रचना की।
पौराणिक कथा – माता कूष्मांडा
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर केवल अंधकार छाया हुआ था, तब आदिशक्ति ने अपने तेजस्वी रूप से ब्रह्मांड की रचना की।
माता ने एक छोटी सी मुस्कान (उमा-हास) के द्वारा सूर्य और समस्त आकाशगंगाओं को उत्पन्न किया।
इसी कारण इन्हें सृष्टि की जननी कहा जाता है।
माना जाता है कि ब्रह्मांड के भीतर जो जीवन ऊर्जा है, उसका आधार माता कूष्मांडा ही हैं। वे ही अष्टभुजा देवी के रूप में समस्त लोकों का पालन-पोषण करती हैं।
माता कूष्मांडा का स्वरूप
माता कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और भव्य है।
- वे अष्टभुजा (आठ भुजाओं) वाली देवी हैं।
- उनके हाथों में कमंडलु, धनुष-बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र, गदा और जपमाला विराजमान हैं।
- वे सिंह पर सवार रहती हैं, जो पराक्रम और शक्ति का प्रतीक है।
- उनके चेहरे पर सृष्टि की जननी होने का तेज झलकता है।
नवरात्रि के चौथे दिन पूजा विधि
पूजन की तैयारी
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल पर मां कूष्मांडा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- कलश स्थापना करें और मां का ध्यान करें।
पूजन प्रक्रिया
- मां को धूप, दीप, अक्षत, गंध और पुष्प अर्पित करें।
- उन्हें गुड़ और मालपुआ का भोग लगाना विशेष शुभ माना जाता है।
- भोग में कद्दू (कूष्मांड) भी अर्पित करने की परंपरा है।
- मंत्र का जप करें:- "ॐ देवी कूष्मांडायै नमः"
पूजा का महत्व और लाभ
- माता कूष्मांडा की पूजा से दीर्घायु, आरोग्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
- साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- कार्यों में सफलता और बाधाओं का नाश होता है।
- गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
- साधक को आध्यात्मिक साधना में स्थिरता मिलती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
माता कूष्मांडा का संबंध अनाहत चक्र (हृदय चक्र) से है।
यह चक्र प्रेम, करुणा और ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।
इस चक्र के सक्रिय होने से साधक के जीवन में दिव्यता, सहानुभूति और आत्मबल का विकास होता है।
दार्शनिक संदेश
माता कूष्मांडा की कथा यह सिखाती है कि –
- सृष्टि की हर वस्तु एक ऊर्जा से संचालित होती है।
- सकारात्मक सोच और मुस्कान से अंधकार दूर किया जा सकता है।
- जीवन में करुणा और प्रेम बनाए रखना चाहिए, तभी वास्तविक सुख मिलता है।
आधुनिक जीवन में माता कूष्मांडा का महत्व
आज की भागदौड़ और तनावपूर्ण जिंदगी में माता कूष्मांडा का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।
- उनका स्वरूप हमें सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
- कार्य में सफलता और मानसिक शांति के लिए उनका ध्यान लाभकारी है।
- परिवार में सुख-शांति और समृद्धि के लिए उनकी पूजा की जाती है।
निष्कर्ष
नवरात्रि का चौथा दिन मां कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है।
उनका स्वरूप सृष्टि की आद्यशक्ति का प्रतीक है।
उनकी पूजा से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है।
माता कूष्मांडा हमें यह संदेश देती हैं कि –
सकारात्मकता, करुणा और प्रेम से ही जीवन का अंधकार दूर किया जा सकता है और वास्तविक सुख-समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।
मुझे उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपने यह पूरा आर्टिकल पढ़ा, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏

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