नवरात्रि दिन 6 : मां कात्यायनी की कथा, महत्व और पूजा विधि

मां कात्यायनी का दिव्य स्वरूप  सिंह पर सवार मां कात्यायनी की प्रतिमा  नवरात्रि छठे दिन की पूजा विधि  महिषासुर वध करती मां कात्यायनी  गोपियों द्वारा मां कात्यायनी की पूजा


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नवरात्रि स्पेशल : छठा दिन – मां कात्यायनी की कथा और महत्व

नवरात्रि का पर्व भारतीय संस्कृति में शक्ति और भक्ति का अद्वितीय संगम है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। प्रत्येक दिन मां के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है, और हर स्वरूप का अपना महत्व, अपनी कथा और अपनी साधना पद्धति है। नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है।

माता कात्यायनी को युद्ध की देवी, सिंहवाहिनी और महिषासुर मर्दिनी कहा गया है। उनका स्वरूप तेजस्वी, पराक्रमी और दिव्य है। आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि मां कात्यायनी का स्वरूप कैसा है, उनकी कथा क्या कहती है, उनकी पूजा विधि और महत्व क्या है तथा वे हमारे जीवन को किस प्रकार प्रेरित करती हैं।


मां कात्यायनी का स्वरूप

मां कात्यायनी अत्यंत तेजस्वी और आभामयी रूप में विराजमान होती हैं। उनके स्वरूप का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है –

  • वे सुनहरी आभा से युक्त हैं।
  • उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और वीरता का प्रतीक है।
  • उनके चार भुजाएं हैं।
  • वे एक हाथ में कमल का पुष्प धारण करती हैं, जो शांति और ज्ञान का प्रतीक है।
  • दूसरे हाथ में तलवार होती है, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश का प्रतीक है।
  • शेष दो हाथों में वरमुद्रा और अभयमुद्रा है, जो भक्तों को आशीर्वाद और निडरता प्रदान करती हैं।

मां का यह स्वरूप भक्तों को आत्मबल, आत्मविश्वास और संकटों से जूझने की शक्ति देता है।


माता कात्यायनी की उत्पत्ति की कथा

मां कात्यायनी के जन्म की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है।

प्राचीन काल में ऋषि कात्यायन नाम के एक महान तपस्वी थे। वे अत्यंत धर्मनिष्ठ और मां भगवती के परम उपासक थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग मां दुर्गा की तपस्या और भक्ति में व्यतीत किया। उनकी गहन तपस्या से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके घर जन्म लेंगी।

उसी समय देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, महिषासुर नामक दैत्य का वध करने के लिए देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया। ऋषि कात्यायन की पुत्री होने के कारण वे कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

बड़े होने पर मां कात्यायनी ने देवताओं का उद्धार करने के लिए महिषासुर से युद्ध किया और उसे परास्त कर दिया। इस प्रकार वे महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।


मां कात्यायनी और श्रीकृष्ण की कथा

भागवत पुराण में वर्णित है कि जब गोपियाँ श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं, तो उन्होंने मार्गदर्शन हेतु मां कात्यायनी की पूजा की। मार्गशीर्ष मास में उन्होंने यमुना के तट पर मां कात्यायनी का व्रत रखा और पूरे भक्ति भाव से उनकी आराधना की।

मां कात्यायनी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और अंततः गोपियों की मनोकामना पूरी हुई। इसलिए मां कात्यायनी को प्रेम और विवाह की देवी भी कहा जाता है। आज भी अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर की प्राप्ति के लिए मां कात्यायनी की आराधना करती हैं।


मां कात्यायनी की पूजा विधि

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की विधिवत पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा की संक्षिप्त विधि इस प्रकार है:

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान पर मां कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. गंगाजल से स्थान और प्रतिमा को शुद्ध करें।
  4. देवी को लाल या गुलाबी रंग के पुष्प अर्पित करें।
  5. मां को शहद का भोग विशेष रूप से अर्पित करें, क्योंकि यह उनका प्रिय है।
  6. धूप, दीप, अक्षत और पुष्प अर्पित करके मां की स्तुति करें।
  7. "ॐ कात्यायन्यै नमः" मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें।
  8. आरती करें और परिवार तथा समाज के कल्याण की कामना करें।


मां कात्यायनी की आराधना का महत्व

मां कात्यायनी की पूजा से भक्त को विशेष फल प्राप्त होते हैं।

  • अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है।
  • वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
  • साधक को साहस, आत्मविश्वास और शक्ति की प्राप्ति होती है।
  • जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ और बाधाएँ दूर होती हैं।
  • आध्यात्मिक साधना करने वालों को ज्ञान और ध्यान में सफलता मिलती है।


आध्यात्मिक दृष्टि से मां कात्यायनी

योगशास्त्र के अनुसार मां कात्यायनी की साधना से आज्ञा चक्र (भौंहों के बीच स्थित ऊर्जा केंद्र) जागृत होता है। यह चक्र ज्ञान, अंतर्ज्ञान और दिव्य दृष्टि का केंद्र है। जब यह सक्रिय होता है, तो साधक को आत्मज्ञान, स्पष्टता और जीवन का गहन बोध प्राप्त होता है।


मां कात्यायनी से मिलने वाली प्रेरणा

मां कात्यायनी केवल युद्ध और विजय की देवी ही नहीं हैं, बल्कि वे जीवन जीने की कला भी सिखाती हैं।

  1. वे सिखाती हैं कि अन्याय और अत्याचार को कभी सहन नहीं करना चाहिए।
  2. धर्म की रक्षा और सत्य की विजय के लिए हमें साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।
  3. उनका स्वरूप यह दर्शाता है कि कोमलता (कमल) और कठोरता (तलवार) का संतुलन जीवन में आवश्यक है।
  4. वे हमें आत्मविश्वास और निर्भयता का संदेश देती हैं।


लोक परंपराओं में मां कात्यायनी

भारत के कई हिस्सों में मां कात्यायनी की पूजा विशेष धूमधाम से होती है।

  • उत्तर प्रदेश और बिहार में अविवाहित कन्याएँ मां कात्यायनी की विशेष पूजा करती हैं।
  • राजस्थान और गुजरात में गरबा और डांडिया के दौरान मां कात्यायनी की स्तुति की जाती है।
  • दक्षिण भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु में भी मां कात्यायनी को शक्ति का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।


निष्कर्ष

नवरात्रि का छठा दिन मां कात्यायनी की उपासना के लिए समर्पित है। उनका स्वरूप केवल शक्ति और साहस का प्रतीक ही नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम और करुणा का भी संदेश देता है। मां कात्यायनी हमें सिखाती हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, हमें सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए और साहस के साथ अन्याय का सामना करना चाहिए।

नवरात्रि में मां कात्यायनी की पूजा करने से भक्त को आत्मबल, प्रेम, विवाह में सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि छठे दिन का महत्व नवरात्रि के नौ दिनों में विशेष स्थान रखता है।


जय माता दी – मां कात्यायनी सभी भक्तों को साहस, प्रेम और जीवन में सफलता प्रदान करें।


नवरात्रि स्पेशल : छठा दिन – मां कात्यायनी के मंत्र और महत्व

मां कात्यायनी के मंत्र

1. बीज मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नमः॥

2. ध्यान मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यान्महासुरमर्दिनि॥

3. गोपी स्तुति मंत्र

कात्यायनि महा-माये महा-योगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥


पूजा का महत्व और फल

  • विवाह में आ रही बाधाएँ दूर होती हैं।
  • दांपत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
  • जीवन में आत्मविश्वास, साहस और निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
  • साधक को ज्ञान और योग साधना में सफलता प्राप्त होती है।
  • परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।


योग और आध्यात्मिक दृष्टि

योग शास्त्र के अनुसार मां कात्यायनी की साधना से आज्ञा चक्र सक्रिय होता है।

  • यह चक्र अंतर्ज्ञान और आत्मज्ञान का केंद्र है।
  • साधक को सही-गलत का विवेक मिलता है।
  • ध्यान और समाधि में गहरी अनुभूति प्राप्त होती है।


लोककथाएँ और जनमान्यताएँ

  • ब्रज क्षेत्र में आज भी मार्गशीर्ष मास में अविवाहित कन्याएँ मां कात्यायनी व्रत करती हैं।
  • राजस्थान के कुछ हिस्सों में विवाह योग्य लड़कियाँ इस दिन विशेष गीत गाती हैं, जिन्हें कात्यायनी गीत कहा जाता है।
  • गुजरात और उत्तर भारत में डांडिया और गरबा के दौरान मां कात्यायनी की विशेष आराधना होती है।


प्रेरणा

  1. अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस।
  2. जीवन में संतुलन – कोमलता और कठोरता का सामंजस्य।
  3. आत्मविश्वास और निर्भयता का संचार।
  4. प्रेम और भक्ति का महत्व।
  5. कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति।


निष्कर्ष

नवरात्रि का छठा दिन हमें यह संदेश देता है कि जीवन केवल भक्ति और करुणा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें साहस और संघर्ष का भी महत्व है। मां कात्यायनी हमें सिखाती हैं कि जब अन्याय बढ़े तो सत्य और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना ही धर्म है।

उनकी आराधना से भक्त को आत्मबल, विवाह में सफलता, पारिवारिक सुख और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इसीलिए मां कात्यायनी की पूजा का महत्व नवरात्रि में विशेष है।


जय मां कात्यायनी 🙏

मुझे उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपने यह पूरा आर्टिकल पढ़ा, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏


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