नमस्ते दोस्तों 🙏, ArticleContHindi ब्लॉग में आपका स्वागत है। मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि आप यह पूरा आर्टिकल पढ़ें, ताकि आपको वह जानकारी मिल सके जिसकी आपको ज़रूरत है।
🪔 नरक चतुर्दशी 2025 : महत्व, पूजा विधि, कथा और शुभ मुहूर्त
परिचय : नरक चतुर्दशी क्या है?
नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली, रूप चौदस, काली चौदस या यम चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह त्योहार दीपावली से एक दिन पहले आता है और इसका धार्मिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व है।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था, जिससे देवताओं और संतों को मुक्ति मिली। इसीलिए इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। यह दिन अंधकार पर प्रकाश की विजय और अज्ञान पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी का धार्मिक महत्व
नरक चतुर्दशी को पापों से मुक्ति और आत्मशुद्धि का दिन माना जाता है। इस दिन स्नान, दान, दीपदान और भगवान की पूजा करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन प्रातःकाल तेल स्नान करने, यमराज की पूजा और दीपदान करने से नरक में जाने का भय समाप्त होता है। इसीलिए इसे “यम दीपदान” भी कहा जाता है।
नरक चतुर्दशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त
- तिथि – 20 अक्टूबर 2025 (सोमवार)
- चतुर्दशी तिथि प्रारंभ – 19 अक्टूबर 2025, रात्रि 11:18 बजे
- चतुर्दशी तिथि समाप्त – 20 अक्टूबर 2025, रात्रि 09:45 बजे
- अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त – प्रातः 04:45 बजे से 06:15 बजे तक
- दीपदान मुहूर्त – सायं 06:00 बजे से 08:00 बजे तक
(समय पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकता है।)
नरक चतुर्दशी की कथा (Narakasura Vadh Katha)
पुराणों के अनुसार, राक्षस नरकासुर अत्यंत शक्तिशाली था। उसने भगवान वराह और देवी पृथ्वी से जन्म लिया था। अत्यधिक बलशाली होने के कारण वह अभिमानी बन गया और स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक, यहां तक कि देवलोक तक पर अधिकार करने लगा। उसने 16,000 कन्याओं को बंदी बना लिया और देवराज इंद्र के आभूषण तक छीन लिए।
जब उसका अत्याचार बढ़ गया, तब देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से मदद मांगी। श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ युद्ध किया। युद्ध के दौरान सत्यभामा ने अपने धनुष से नरकासुर का वध किया।
नरकासुर के मरने से सभी देवता और कन्याएं मुक्त हो गए। उसी दिन देवताओं ने आनंद में दीप जलाए और स्वर्ग व पृथ्वी दोनों में प्रकाश फैला।
इसलिए इस दिन दीपदान का विशेष महत्व है।
नरक चतुर्दशी पर पूजा विधि (Puja Vidhi)
इस दिन की पूजा प्रातःकाल से शुरू होती है। माना जाता है कि सूर्योदय से पहले तेल स्नान करने से शरीर और आत्मा दोनों शुद्ध हो जाते हैं।
पूजा विधि के चरण:
- प्रातःकाल अभ्यंग स्नान करें – तिल के तेल से सिर व शरीर पर मालिश करें और उबटन लगाकर स्नान करें।
- नए वस्त्र धारण करें – स्नान के बाद साफ व नए वस्त्र पहनें।
- दीपदान की तैयारी करें – मिट्टी के दीपक में तिल का तेल डालें और बाती लगाएं।
- भगवान कृष्ण और यमराज की पूजा करें – दीपक के सामने श्रीकृष्ण और यमराज की प्रार्थना करें।
- यम दीपदान करें – संध्या के समय घर के द्वार पर, आंगन में या नदी तट पर दीपक जलाकर रखें।
- भोजन और दान – दिनभर सात्विक भोजन करें और जरूरतमंदों को दान दें।
नरक चतुर्दशी पर स्नान का महत्व (Abhyang Snan Importance)
हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णन है कि इस दिन अभ्यंग स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे नरक के भय से मुक्ति मिलती है।
यह स्नान सूर्योदय से पहले किया जाना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद दीपदान करने से जीवन में समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
नरक चतुर्दशी के अन्य नाम
भारत के विभिन्न राज्यों में नरक चतुर्दशी को अलग-अलग नामों से जाना जाता है—
- उत्तर भारत – छोटी दिवाली
- गुजरात – रूप चौदस
- महाराष्ट्र – नरक चतुर्दशी या यम दीपदान
- दक्षिण भारत – दीपावली का पहला दिन हर क्षेत्र में इसके रीति-रिवाज अलग हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही — पापों का नाश और आत्मा की शुद्धि।
रूप चौदस का सौंदर्य से संबंध
कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी से कहा था कि जो व्यक्ति इस दिन स्नान, सुगंध, उबटन और सौंदर्य का ध्यान रखेगा, उसके शरीर में तेज और कांति बनी रहेगी।
इसी कारण इस दिन महिलाएं और पुरुष उबटन, तेल मालिश और स्नान करते हैं, जिसे “रूप चौदस स्नान” कहा जाता है।
यम दीपदान की परंपरा
शाम को यमराज के नाम दीपदान करने की परंपरा सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन यमराज के लिए दीप जलाता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
दीपदान विधि:
- शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर एक दीपक जलाएं।
- दीपक में तिल का तेल और रुई की बाती का प्रयोग करें।
- दीप जलाते समय यह मंत्र बोलें –
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥”
नरक चतुर्दशी और दीपावली का संबंध
दीपावली पाँच दिनों का पर्व है – धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज।
इनमें नरक चतुर्दशी दूसरा दिन है। यह दिन अंधकार को दूर करने और प्रकाश फैलाने की शुरुआत माना जाता है।
दीपक जलाने की परंपरा इसी दिन से शुरू होती है जो दिवाली की रात अपने चरम पर होती है।
नरक चतुर्दशी पर क्या करें और क्या न करें
✅ क्या करें:
- सूर्योदय से पहले तेल स्नान करें
- यमराज और श्रीकृष्ण की पूजा करें
- दीपदान करें
- घर की सफाई और सजावट करें
- जरूरतमंदों को दान करें
❌ क्या न करें:
- देर से उठना
- क्रोध, झगड़ा या बुरे शब्द बोलना
- असत्य बोलना या किसी का अपमान करना
- नशा या मांसाहार का सेवन करना
नरक चतुर्दशी का वैज्ञानिक महत्व
तेल मालिश और स्नान से शरीर की त्वचा साफ होती है, रक्तसंचार बढ़ता है और मन तरोताजा होता है।
दीपक जलाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है और मानसिक शांति मिलती है।
इस प्रकार यह त्योहार स्वास्थ्य, स्वच्छता और मानसिक संतुलन का संदेश भी देता है।
लोक मान्यताएँ और रीति-रिवाज
भारत के अलग-अलग हिस्सों में इस दिन कई विशेष परंपराएँ निभाई जाती हैं।
- महाराष्ट्र में लोग “अभ्यंग स्नान” के बाद मिठाई और विशेष व्यंजन बनाते हैं।
- गुजरात में रूप चौदस पर महिलाएं सौंदर्य के लिए उबटन लगाती हैं।
- दक्षिण भारत में इस दिन दीपावली का मुख्य पर्व माना जाता है।
- उत्तर भारत में इसे छोटी दिवाली के रूप में मनाया जाता है, जिसमें लोग घरों को दीपों से सजाते हैं।
नरक चतुर्दशी से जुड़ी शिक्षाएँ
नरक चतुर्दशी हमें सिखाती है कि—
- अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है।
- सत्य, धर्म और प्रेम की विजय सदैव होती है।
- हर इंसान को अपने भीतर के अंधकार (पाप, ईर्ष्या, क्रोध) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान, करुणा, भलाई) फैलाना चाहिए।
समापन : प्रकाश और पुण्य का पर्व
नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पर्व भी है। यह हमें सिखाती है कि अपने जीवन से नकारात्मकता, अंधकार और बुराइयों को दूर कर अच्छाई, प्रकाश और ज्ञान को अपनाना चाहिए।
इस दिन का पालन श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध मन से करने पर व्यक्ति को न केवल सांसारिक सुख मिलता है, बल्कि आत्मिक शांति भी प्राप्त होती है।
🔖 नरक चतुर्दशी पर आधारित संक्षिप्त जानकारी (Quick Facts)
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पर्व का नाम | नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली / रूप चौदस |
| तिथि | कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी |
| वर्ष 2025 तिथि | 20 अक्टूबर 2025 |
| प्रमुख देवता | भगवान श्रीकृष्ण, यमराज |
| उद्देश्य | पापों से मुक्ति और आत्मशुद्धि |
| विशेष कर्म | अभ्यंग स्नान, दीपदान, पूजा |
| मुख्य मंत्र | “मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह...” |
| महत्व | अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक |
🕯️ निष्कर्ष
नरक चतुर्दशी का पर्व दिवाली की तैयारी का आरंभिक चरण है। यह हमें सिखाता है कि जैसे भगवान कृष्ण ने नरकासुर का अंत किया, वैसे ही हमें अपने भीतर के अंधकार का अंत करना चाहिए। इस दिन किया गया स्नान, पूजा और दीपदान हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।
✨ सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएँ ✨
“दीपों का यह पर्व आपके जीवन से अंधकार मिटाए और सुख-समृद्धि का प्रकाश फैलाए।”
मुझे उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। आपने यह पूरा आर्टिकल पढ़ा, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏
0 Comments